एक माँ की अंतिम इच्छा नहीं, लेकिन अंतिम विरासत—चार परिवारों को मिली नई ज़िंदगी
11 जुलाई 2026 का दिन पंजाब में अंगदान के इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा।
लुधियाना निवासी स्वर्गीय श्रीमती शुक्ला मित्तल (80 वर्ष) को ब्रेन स्ट्रोक के बाद दयानंद मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (DMC), लुधियाना में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों के अथक प्रयासों के बावजूद उन्हें ब्रेन डेड घोषित किया गया।
यह परिवार के लिए असहनीय दुःख का समय था। लेकिन इसी कठिन घड़ी में उनके पति श्री सुरेश पाल मित्तल और पुत्र श्री विनय मित्तल ने ऐसा निर्णय लिया जिसने कई परिवारों की ज़िंदगी बदल दी। उन्होंने अपनी पत्नी और माँ के अंग दान करने का साहसिक और प्रेरणादायक फैसला लिया।

परिवार को इस मानवीय निर्णय के लिए डॉ. पी. एल. गौतम, विभागाध्यक्ष, क्रिटिकल केयर, DMC लुधियाना ने संवेदनशीलता के साथ प्रेरित किया और अंगदान की पूरी प्रक्रिया के बारे में समझाया।
इसके बाद डॉ. गुरसागर सिंह सहोता, चीफ लिवर ट्रांसप्लांट सर्जन, DMC लुधियाना के मार्गदर्शन और निगरानी में सफलतापूर्वक अंग निकासी (Organ Retrieval) की गई। उनकी लीवर, दोनों किडनी और कॉर्निया प्रत्यारोपण के लिए सुरक्षित रूप से निकाले गए।

उनका लीवर होशियारपुर के 44 वर्षीय एक गंभीर रूप से बीमार मरीज को प्रत्यारोपित किया गया, जो लंबे समय से लिवर फेलियर से जूझ रहा था और ICU में भर्ती था। उसकी स्थिति इतनी गंभीर थी कि बिना लिवर ट्रांसप्लांट के शायद वह कुछ ही दिनों का मेहमान था।
सफल लिवर ट्रांसप्लांट के बाद जब मरीज के 10 वर्षीय बेटे ने डॉक्टरों का हाथ पकड़कर अपने पिता की जान बचाने के लिए धन्यवाद कहा, तो वह क्षण पूरे ट्रांसप्लांट दल के लिए भावुक कर देने वाला था।
श्रीमती शुक्ला मित्तल की दोनों किडनियों ने दो ऐसे मरीजों को नया जीवन दिया, जो वर्षों से डायलिसिस पर निर्भर थे। आज दोनों मरीज स्वस्थ हैं और डायलिसिस से मुक्त होकर सामान्य जीवन की ओर लौट रहे हैं।
उनके कॉर्निया दान से एक अन्य व्यक्ति को फिर से देखने की उम्मीद मिली, जो कॉर्नियल अंधत्व से पीड़ित था।
इस महान और प्रेरणादायक निर्णय के लिए अजूनी लाइफलाइन वेलफेयर सोसाइटी ने मित्तल परिवार को उनके निवास स्थान पर जाकर सम्मानित किया। संस्था ने परिवार को कृतज्ञता स्वरूप एक स्मृति-चिन्ह भेंट किया और समाज के सामने उनके इस मानवीय योगदान को एक प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत किया।
श्रीमती शुक्ला मित्तल आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका निर्णय चार परिवारों की मुस्कान बन चुका है। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि अंगदान केवल मृत्यु के बाद का निर्णय नहीं, बल्कि किसी और के जीवन की नई शुरुआत है।
